नन्दीश्वर के चारों ओर बंद होता समुद्र, 3,27,68,00,000 योजन चौड़ा। साधारण जल।
जिस द्वीप को घेरता है उससे दुगुना चौड़ा, जैसा हर समुद्र होता है। चार स्वाद वाले समुद्रों के बाद जल फिर जल हो जाता है और शेष समस्त लोक में वैसा ही रहता है।
इसके आगे वलय चलते रहते हैं - अरुण, अरुणवर, अरुणाभास, कुण्डल, रुचक और आगे - असंख्य, सदा दुगुने होते हुए, जब तक स्वयम्भूरमण मध्यलोक को बंद न कर दे।