ग्रंथ · सबसे प्राचीन स्तर
औपपातिक सूत्र
औपपातिक सूत्र
प्रथम उपांग। इसका आरम्भिक अध्याय समवसरण कहलाता है, और उसमें कोई रचना नहीं है।
उसमें जो है: महावीर का चम्पा के बाहर पूर्णभद्र चैत्य में आना, राजा कूणिक की उन्हें लेने निकली सवारी, एक वन-उपवन, एक अशोक वृक्ष, और उसके नीचे एक शिलापट्ट।
और एक गणना — चौदह हज़ार श्रमणों और छत्तीस हज़ार श्रमणियों से घिरे हुए। ये बारह परिषदों के साधु और साध्वियाँ हैं, गिने हुए, इससे पहले कि उनके बैठने के लिए कोई स्थान बना हो।
कोई प्राकार नहीं। कोई द्वार नहीं। कोई तलबद्ध परिषदें नहीं। इस स्तर पर समवसरण सभा को ही कहते हैं, किसी स्थान को नहीं।
माप और संख्याएँ
| स्थान | प्रथम उपांग |
|---|---|
| स्थल | पूर्णभद्र चैत्य, चम्पा के बाहर |
| श्रमण | 14,000 |
| श्रमणी | 36,000 |