लोक
जो कुछ भी है, वह सब एक सीमित, अनिर्मित आकाश में है, जिसका आकार खड़े हुए मनुष्य जैसा है। उसके बाहर अनंत काल तक केवल शून्य है।
जैन लोक-रचना एक अस्वीकार से आरम्भ होती है। विश्व को किसी ने बनाया नहीं, कोई उसे चला नहीं रहा, कोई उसका अंत भी नहीं करेगा। लोक बस है, और सदा से है। उसके भीतर जो निरंतर चलता रहता है वह है देह से देह में जीवों का अनवरत आवागमन।
उसका आकार निश्चित है। चित्रकार उसे पाँव फैलाकर और कमर पर हाथ रखकर खड़े व्यक्ति के रूप में बनाते हैं — नीचे चौड़ा, बीच में सँकरा, छाती पर फिर चौड़ा, शिखर पर पतला। ऊपर से नीचे तक वह 14 रज्जु है।
उसके भीतर तीन मंज़िलें हैं। नीचे Adho Loka, कमर पर Madhya Loka, ऊपर Ūrdhva Loka, और सबसे शिखर पर Siddhaśilā, जहाँ जन्म-मरण से मुक्त जीव जाकर स्थिर हो जाते हैं और फिर कभी नहीं हिलते।
एक रज्जु चौड़ा स्तम्भ पूरी ऊँचाई में बीचोंबीच चलता है — Trasa-nāḍī। अपनी शक्ति से चलने-फिरने वाले जीव केवल उसी के भीतर मिलते हैं।
माप और संख्याएँ
| ऊँचाई | 14 रज्जु |
|---|---|
| तल पर चौड़ाई | 7 रज्जु |
| कमर पर चौड़ाई | 1 रज्जु |
| ऊपर अधिकतम चौड़ाई | 5 रज्जु |
| घनफल | 239 घन रज्जु (श्वेताम्बर) |
| निर्माता | कोई नहीं |
| उसके बाहर | अलोक — शून्य आकाश |