जहाँ मुक्त जीव विराजते हैं
सिद्धशिला
सिद्धशिला
लोक के शिखर पर श्वेत स्फटिक की अर्धचन्द्राकार शिला। जो जीव वहाँ पहुँच गया, वह फिर कभी नहीं हिलता।
कर्म से मुक्त जीव ऊपर उठता है, क्योंकि जब कोई भार न रहे तब ऊपर उठना ही जीव का स्वभाव है। वह सीधा ऊपर जाता है और लोकाकाश की सीमा पर रुक जाता है — क्योंकि उससे आगे गति का माध्यम ही नहीं है।
यह शिला 45,00,000 योजन चौड़ी है, ठीक उतनी ही जितना नीचे Aḍhāī-dvīpa है। यह संयोग नहीं है। मोक्ष केवल मनुष्य-लोक से होता है, इसलिए छत उतनी ही है जितना फ़र्श।
इसका आकार उलटे छाते जैसा है — बीच में आठ योजन मोटी, किनारों की ओर पतली होती हुई। उसके ठीक ऊपर विराजते सिद्धों का न शरीर है, न नाम, न परस्पर कोई स्थान, और न आगे कोई कथा।
माप और संख्याएँ
| चौड़ाई | 45,00,000 योजन |
|---|---|
| बीच में मोटाई | 8 योजन |
| आकार | उलटा छाता |
| छत से दूरी | 1 योजन |
| निवासी | सिद्ध — अशरीरी, अनंत |