मोक्ष
जन्म-मरण का अंत। जीव समस्त कर्म झाड़ देता है, लोक के शिखर तक उठता है, और वहीं रह जाता है।
जैन दृष्टि में जीव स्वभाव से भाररहित है और स्वभाव से ऊर्ध्वगामी। कर्म एक सूक्ष्म पौद्गलिक द्रव्य है जो उससे चिपककर उसे शरीरों में खींचता है। कर्म हटा दीजिए, जीव अपने स्वभाव से ही ऊपर उठ जाता है।
वह सीधा ऊपर जाता है, एक ही समय में, और लोकाकाश की सीमा पर रुक जाता है — क्योंकि गति को माध्यम चाहिए और उस सीमा के आगे कोई माध्यम नहीं। वही विश्रामस्थल Siddhaśilā है।
सिद्ध का न शरीर है, न नाम, न लिंग, न अन्य सिद्धों के सापेक्ष कोई स्थान, और न आगे कोई घटना। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य — और घटित कुछ भी नहीं होता।
यह सारा मानचित्र यही कहने के लिए है कि यह कहाँ सम्भव है: 170 स्थानों में, कुछ ही कालों में, मनुष्य जन्म से। यह द्वार सँकरा है, और सँकरा होना ही इसका अभिप्राय है।
माप और संख्याएँ
| कहाँ से | 170 कर्मभूमियाँ |
|---|---|
| किस जन्म से | केवल मनुष्य |
| दिशा | सीधे ऊपर |
| यात्रा की अवधि | एक समय |
| गंतव्य | सिद्धशिला |
| वापसी | नहीं |