कर्म की भूमियाँ
कर्मभूमि
कर्मभूमि
वे 170 क्षेत्र जहाँ परिश्रम आवश्यक है, धर्म है, और मोक्ष सम्भव है।
पाँच भरत, पाँच ऐरावत और 160 विजय। सम्पूर्ण लोक में और कहीं जीव अपने जन्म-मरण का अंत नहीं कर सकता।
इनका लक्षण सुख नहीं, प्रयत्न है। कर्मभूमि में अन्न उगाना पड़ता है, विवाद निपटाने पड़ते हैं, और मनुष्य त्याग का निर्णय ले सकता है। चुनाव है, इसीलिए कर्म झड़ सकते हैं। भोगभूमि में सब कुछ प्राप्त है और कुछ त्यागा नहीं जा सकता, इसलिए वहाँ कुछ बदलता नहीं।
अतः 170 ही वह अधिकतम संख्या है जितने तीर्थंकर सम्पूर्ण लोक में एक साथ हो सकते हैं — प्रति कर्मभूमि एक।
माप और संख्याएँ
| कुल | 170 |
|---|---|
| भरत | 5 |
| ऐरावत | 5 |
| विजय | 160 |
| एक साथ अधिकतम तीर्थंकर | 170 |