घातिया
चार कर्म जो जीव के अपने स्वभाव का घात करते हैं: उसके ज्ञान, दर्शन, निर्मलता और वीर्य को ढकते हैं।
ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय। इन्हें अलग करने वाली बात इनका भार नहीं, इनका लक्ष्य है: हर एक उस गुण को ढकता है जो जीव में स्वभाव से है।
इनका समाप्त होना ही केवलज्ञान है। मोहनीय पहले जाता है, बारहवीं सीढ़ी पर; बाकी तीन उसके अन्त में; जिसने चारों झाड़ दिए वह तेरहवीं पर केवली है, अभी सदेह, केवल चार अघातिया शेष जिन्हें पूरा होना है।
माप और संख्याएँ
| सदस्य | ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय |
|---|---|
| झड़ते हैं | 12वें गुणस्थान के अन्त तक |
| फल | केवलज्ञान |
संबंधित
अन्तराय
विघ्न डालने वाला कर्म: 5 उत्तर प्रकृतियाँ, न्यूनतम अन्तर्मुहूर्त और अधिकतम 30 कोटाकोटि सागरोपम तक बँधा।
पाँच उत्तर प्रकृतियाँ, पाँच शक्तियों में विघ्न डालने वाली: दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य।
यह बारहवें के अन्त में समाप्त होता है; केवली का वीर्य निर्विघ्न है।
| प्रकार | घातिया — घात करने वाला |
|---|---|
| उत्तर प्रकृतियाँ | 5 |
| न्यूनतम बन्ध | अन्तर्मुहूर्त |
| अधिकतम बन्ध | 30 कोटाकोटि सागरोपम |
| समाप्त | गुणस्थान 12 |