आसन · सिंह-पीठ
सिंहासन सिंहासन
पादपीठ सहित रत्नजड़ित सिंहासन, भीतरी प्रांगण के केंद्र में।
तीर्थंकर यहाँ पूर्व की ओर मुख किए विराजते हैं। शेष तीन दिशाओं में तीन आसन निर्मित प्रतिरूप धारण करते हैं, ताकि किसी परिषद् को पीठ न दिखे।
सबसे प्राचीन स्तर पर कोई सिंहासन है ही नहीं — वृक्ष के नीचे एक शिलापट्ट ।
दिगम्बर परम्परा यह जोड़ती है कि तीर्थंकर आसन का स्पर्श नहीं करते, कुछ ऊपर विराजते हैं। यह मानचित्रावली श्वेताम्बर गणना का अनुसरण करती है और उसे दूसरी परम्परा का कथन मानकर अंकित करती है।
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 उ पू द प वाहन वाहन तिर्यंच तिर्यंच कौन कहाँ बैठता है 1 Vaimānika devas असंख्यात 2 Śrāvakas गणनीय 3 Śrāvikās गणनीय 4 Sādhus गणनीय 5 Vaimānika devīs असंख्यात 6 Sādhvīs गणनीय 7 Bhavanapati devīs असंख्यात 8 Jyotiṣka devīs असंख्यात 9 Vyantara devīs असंख्यात 10 Bhavanapati devas असंख्यात 11 Jyotiṣka devas असंख्यात 12 Vyantara devas असंख्यात चतुर्विध संघ हर जिन के लिए भिन्न देवों के आठ वर्ग असंख्यात नीचे के तल वे तिर्यंच जो सुनने आए वे तिर्यंच जो लोगों को यहाँ लाए तीर्थंकर पूर्व की ओर मुख किए हैं। शेष तीन दिशाओं में प्रतिरूप हैं, ताकि किसी परिषद् को पीठ न दिखे। 1 योजन विस्तार · 4 कोस सिंहासन के ऊपर का वृक्ष 3 कोस — तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुना 1 योजन विस्तार · 4 कोस उ उत्तर पू पूर्व द दक्षिण प पश्चिम समवसरण — सिंहासन रेखांकित माप और संख्याएँ मुख पूर्व की ओर ऊपर तीन श्वेत छत्र खड़ा है पीठिका पर
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